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जीवन यात्रा का सहयात्री

जीवन यात्रा का सहयात्री

जीवन यात्रा का सहयात्री  01/11/2021 05:12:41 PM   जीवन यात्रा का सहयात्री   Admin

एक आध्यात्मिक गुरु राजा के राजभवन में गए। वहां उपस्थित किसी भी सिपाही ने गुरु को अंदर जाने से नहीं रोका। गुरुजी सीधा राजसभा में पहुंच गए, जहां राजा एक सिंहासन पर बैठे थे। राजा ने आगन्तुक को देखा अ‍ैर उनकी पहचान करते ही उनसे पूछा -आप क्या चाहते हैं? 'मैंइस धर्मशाला में सोने के लिए थोड़ा स्थान चाहता हूं', गुरु ने कहा। 'पर यह कोई धर्मशाला नहीं है, यह मेरा राजभवन है। 'राजा ने कहा।' गुरु ने कहा, 'क्या मैं यह जान सकता हूँ कि आपसे पहले इस राजभवन पर किसका अधिकार था?' राजा ने कहा, 'मुझसे पहले यह राजभवन मेरे पिताजी का था।' गुरु ने कहा, 'वे अब कहां हैं?' राजा ने कहा, 'उनकी मृत्यु हो गई है।' गुरु ने कहा, 'आपके पिता से पहले यह राजभवन किसका था?' राजा को थोड़ा झुंझलाहट हुई, पर फिर भी उसने शांति से कहा, 'मेरे पिता के पिता अर्थात मेरे दादाजी का यह राजभवन था और उनकी भी मृत्यु हो चुकी है।' अब गुरु ने कहा, 'यह स्थान, जहां लोग कुछ समय ही रह पाए और चले गए। आप कहते होे कि यह धर्मशाला नहीं है। बताओ कि फिर यह क्या है?' राजा ने हाथ जोड़ लिए। वह, अब अपनी गलती समझ चुका था। मोह दीर्घकालिक लक्ष्यों के भय से किसी लघुकालिक आनन्द में स्वयं की इच्छा जागृत करने की प्रवृत्ति को कहते हैं या ज्ञान न होने की अवस्था या भाव, ईश्वरका ध्यान छोड़कर शरीर और सांसारिक पदार्थोंको अपना सर्वस्व समझने की क्रिया या भाव, स्त्री और पुरुष जाति के प्राणियों के बीच का पारस्पारिक स्नेह जो बहुधा रूप, गुण, सान्निध्य या वासना के कारण होता है। अवचेतन (सब-कांशस)- जो चेतना में न होने पर भी थोड़ा प्रयास करने से चेतना में लाया जा सके। उन भावनाओं, इच्छाओं तथा कल्पनाओं का संगठित नाम जो मानव के व्यवहार को अवेचतन की भाँति अज्ञात रूप से प्रभावित करते रहने पर भी चेतना की पहुंच के बाहर नहीं है और जिनको वह अपनी भावनाओं, इच्छाओं तथा कल्पनाओं के रूप में स्वीकार कर सकता है। मानसिक जगत में इसका स्थान प्रमुख तथा अचेतन व चेतन के बीच माना गया है। मन की मुख्यत: दो अवस्थाएं होती हैं। चेतन मन और अवचेतन मन। दोनों के अनेक और भी स्तर होते हैं। चेतन मन इसे जागृत मन भी मान सकते हैं।चेतन मन में रहकर ही हम दैनिक कार्यों को पूर्ण करते हैं अर्थात खुली आँखों से हम कार्य करते हैं परंतु प्राय: लोग जागे हुए भी सोए-सोए से रहते है। अर्थात यह कि जब तक आपके मस्तिष्क में कल्पना विचार, चिंता, भय आदि चल रहे हैं तो आप पूर्ण चेतन नहीं हैं। प्राय: हम सभी अपने जीवन में 99 प्रतिशत या 99.99 प्रतिशत समय इसी अवस्था में रहते हैं और उसी को जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं और हमारा जीवन वह इसी के चारों ओर व्यतीत होने लगता है। हमारे जन्म से मृत्यु के बीच की कालावधि ही 'जीवन' कहलाती है, जो कि हमें ईश्वर द्वारा दिया गया एक वरदान है। हमारा जन्म क्या हमारी इच्छा से होता है? नहीं, यह तो प्रकृति के नियम के अंतर्गत है। इसके अतिरिक्त जीवन का मुख्य अंग एक चेतन तत्व है जो जीवन की सभी क्रियाओं का साक्षी होता है। वैज्ञानिक दृष्किोण से जीवन का तात्पर्य अस्तित्व की उस अवस्था से है जिसमें वस्तु या प्राणी के अन्दर चेष्टा, उन्नति और वृद्धि के लक्षण दिखाई दें। अगर कोई वस्तु चेष्टारहित है तो फिर उसे सजीव या जीवनयुुक्त नहीं माना जाता है। दार्शनिकों के अनुसार जीवन का संबंध जीने से है, मात्र अस्तित्व का विद्यमान होना ही जीवन का चिन्ह नहीं है। ''जीवन वह दशा है, जो पशुओं, पौधों और दूसरे जीवित प्राणियों को अकार्बनिक और कृत्रिम चीजों से अलग करती है और जिसे सतत् चलती रहने वाली चयापचय की क्रिया और वृद्धि की विशेष सामर्थ्य से पहचाना जाता है। अर्थात 'प्रकृतिमय' होना। महर्षि महेश योगी जी जीवन को प्रकृतिमय होने को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। वो कहते थे कि जब हम स्वयं को प्रकृति निष्ठ कर लेते हैं तो हमारी प्रगति, उन्नति, जीवन आनन्द में परिवर्तित हो जाता है। हमारी इच्छायें भी प्रकृतिमय हो जाती हैं और सम्पूर्ण प्रकृति हमारे जीवन को आनन्द से परिपूर्ण करने के प्रयास करने लगती है। मात्र आवश्यकता तो यह है कि हम स्वयं को प्रकृतिमय करने का प्रयास करें। यह अत्यंत कठिन है और इसे सरल बनाया जा सकता है भावातीत ध्यान योग शैली के नियमित प्रात: संध्या को 10 से 15 मिनट के अभ्यास से, क्योंकि यह वह प्रक्रिया है जो आपकी चेतना को जागृत करने में आपकी सहायता करती है। हमारी चेतना ही हमारे जीवन यात्रा की सहयात्री है।


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