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दुःखों की निवृति का मार्ग

दुःखों की निवृति का मार्ग

दुःखों की निवृति का मार्ग  07/01/2022 12:12:38 PM   दुःखों की निवृति का मार्ग   Admin

एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति राजा के पास गया और उसने राजा से कहा कि मेरी सहायता कीजिये। राजा दयालु थे। राजा ने पूछा कि 'क्या सहायता चाहिए?' निर्धन व्यक्ति ने कहा 'थोड़ा-सा भूखंड' राजा ने कहा, 'कल प्रात: सूर्योदय के समय तुम यहाँ आना, भूमि पर तुम दौड़ना जितनी दूर तक दौड़ पाओगे वो पूरा भू-खंड तुम्हारा। परंतु ध्यान रहे, जहाँ से तुम दौड़ना आरंभ करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौट आना होगा, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा।' आदमी प्रसन्न हो गया। सुबह हुई सूर्योदय के साथ आदमी दौड़ने लगा। आदमी दौड़ता रहा, दौड़ता रहा, सूरज सिर पर चढ़ आया था, पर आदमी का दौड़ना नहीं रुका था। वो थोड़ा थकने भी लगा था, पर रुका नहीं उस के मन मे था थोड़ा परिश्रम और करलूँ। फिर सम्पूर्ण जीवन आराम से बीतेगा। संध्या होने लगी थी, निर्धन व्यक्ति को याद आया, सूर्यास्त तक लौटना भी है, अन्यथा कुछ नहीं मिलेगा। उसने वापस दौड़ना आरंभ किया। वो काफी दूर चला आया था। अब उसे वापस समय पर लौटना था। सूरज पश्चिम की ओर हो चुका था। आदमी ने पूरा दम लगा दिया। वो लौट सकता था। पर समय तेजी से बीत रहा था। वो पूरी गति से दौड़ने लगा। पर अब तेजी से दौड़ा भी नहीं जा रहा था। वो हांफने लगा था। पर रूका नहीं दौड़ता रहा, दौड़ता रहा और थक कर गिर पड़ा, उसके प्राण वहीं निकल गए। राजा यह सब देख रहे थे। अपने सहयोगियों के साथ वो वहाँ गये, जहाँ निर्धन व्यक्ति भूमि पर मृत पड़ा था। राजा ने उसे गौर से देखा, फिर मात्र इतना कहा- 'इसे मात्र दो गज भूमि की आवश्यकता थी, नाहक ही ये इतना दौड़ रहा था।' आदमी को लौटना था, पर लौट नहीं पाया, वो लौट गया वहाँ, जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता। हमें अपनी इच्छाओं की सीमा का पता नहीं होता। हमारी आवश्यकताएँ तो सीमित होती हैं, पर इच्छाएँ अनंत। अपनी इच्छाओं के मोह में हम लौटने की तैयारी ही नहीं करते। जब करते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। फिर हमारे पास समय नहीं बचता और हम लौट नहीं पाते। हमें सदैव ठहर कर निश्चित कर लेना चाहिये कि कहीं हम अपने लक्ष्य से दूर तो नहीं हो रहे हैं। हमारा मानना है, कि मनुष्य को जीवित रहने के लिए मात्र प्रेरणा की आवश्यकता होती है। जिसे वह अपने हृदय में धारण करे और उसके मन की वह धुन बन जाये। रोटी-कपड़ा-मकान तो आवश्यक है ही किंतु प्रेरणा, चेतना की वस्तु है। इसके बिना जीवन चलता तो है किंतु निर्रथक रहता है उपरोक्त कथा के निर्धन व्यक्ति के समान। अब प्रश्न उठता है कि प्रेरणा कहाँ से प्राप्त हो, अधिकतर व्यक्ति अपनी छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहते हुए अपने आस-पास धर्नाजन साधनों तक सीमित रह कर उसे ही प्रेरणा मान लेते हैं और कुछ सार्वजनिक व सामुदायिक आस्थाओं में प्रेरणा खोज लेते हैं और बहुत कम लोग ही अपनी चेतना कि जागृति से अपनी प्रेरणा को खोज पाते हैं। भारतीय मनीषियों के उर्वर मस्तिष्क से जिस कर्म, ज्ञान और भक्तिमय का प्रवाह उद्भूत हुआ, उसने दूर-दूर के मानवों के आध्यात्मिक कल्मष को धोकर उन्हें पवित्र, नित्य-शुद्ध-बुद्ध और सदा स्वच्छ बनाकर मानवता के विकास में लगा दिया है। इसी पतितपावनी धारा को लोग भारतीय दर्शन के नाम से पुकारते हैं। भारत में 'दर्शन' उस विद्या को कहा जाता है जिसके द्वारा तत्व का ज्ञान हो सके। 'तत्व दर्शन' या 'दर्शन' का अर्थ है तत्व का ज्ञान। मानव के दुखों की निवृति के लिए और तत्व ज्ञान कराने के लिए ही भारत में दर्शन का जन्म हुआ है। हृदय की गाँठ तभी खुलती है और शोक तथा संशय तभी दूर होते हैं, जब एक सत्य का दर्शन होता है। मनु का कथन है कि सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर कर्म मनुष्य को बन्धन में नहीं डाल सकते तथा जिनको सम्यक दृष्टि नहीं है वे ही संसार के महामोह और जाल में फंस जाते हैं। भारतीय ऋषिओं ने जगत के रहस्य को अनेक कोणों से समझने का प्रयास किया है। इस दर्शन की शनै:-शनै: अनुभूति कराता है परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित 'भावातीत ध्यान योग' जिसका नियमित तथा प्रतिदिन प्रात: व संख्या के समय 15 से 20 मिनट का अभ्यास हमारे दु:खों कि निवृति का मार्ग प्रशस्त करता है। जिससे हमारा जीवन आनंद से भर जाता है। स्मरण रहे- ''जीवन आनंद है।''


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